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Tuesday, May 15, 2018

भ्रमित स्थिति में बुद्धि और आत्मा का तटस्थ प्रभाव

प्रश्न:  अभी जो हम कुछ गलत करते हैं तो हमको अपनी "गलती" का एहसास होता है, वो कैसे होता है?

उत्तर:  बुद्धि और आत्मा का प्रभाव जीवन में रहता ही है, इसी आधार  पर "गलती" का स्वीकृति होता है कि यह हमसे कुछ गलत हो गया.   यह न हो तो आदमी में गलती का स्वीकृति ही न हो.

प्रश्न:  इस प्रभाव का क्या स्वरूप है?

उत्तर: यह तटस्थ प्रभाव है.  आत्मा और बुद्धि जीवन की दस क्रियाओं में अविभाज्य हैं.  मन, वृत्ति और चित्त में जो अभी तक संपादित हुआ वह बुद्धि के योग्य हुआ नहीं.   बुद्धि उसको नकार देता है वह चित्रण में स्मृति क्षेत्र तक रह जाता है.  तटस्थ बुद्धि और आत्मा के प्रभाव के आधार पर कल्पना में अच्छाई की चाहत बन जाती है.  मानव में अच्छाई की चाहत जो है वह आत्मा और बुद्धि का ही प्रभाव है.

प्रश्न: इससे तो ऐसे लगता है कि आत्मा और बुद्धि को पहले से ही सही और गलत का पता है?

उत्तर: सही लगना और गलत लगना यह मानव के साथ है, जो जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है.  भ्रमित रहते तक "सही लगना" और "गलत लगना" यह होता है.  पर सही क्या है - यह पता नहीं चलता.  गलत क्या है यह किसी किसी परिस्थिति में पता चलता है, पर सही क्या है यह पता न होने से किसी गलत को ही अपना के वह चल देता है.

जैसे - मार्क्स ने कहा, सुविधा-संग्रह ठीक नहीं है.  किन्तु वो जो रास्ता निकाला उसमे राष्ट्र के नाम पर सुविधा-संग्रह को छोड़ नहीं पाया.

इस तरह भ्रमित अवस्था में "गलत" की स्वीकृति कहीं कहीं है, पर "सही" का पता नहीं है.  अभी तक मानव में पायी जाने वाली शुभकामना का आधार इतना ही है.

आदर्शवादी इस "गलत" के विरोध में चल दिए, पर "सही" क्या है - वे बता नहीं पाए. 

प्रश्न:  आदर्शवाद ने कुछ कृत्यों को "गलत" किस आधार पर और किस प्रकार कहा?

उत्तर: कल्पना के आधार पर.  जैसे पाप-पुण्य की व्याख्या करते हुए यह करो, यह मत करो - इस प्रकार की बात किये.  पर वह आचरण तक पहुंचा नहीं, न व्यवस्था तक पहुंचा. 

परंपरा में शुभ को, अच्छाई को चाहा है.  लेकिन अच्छाई का स्वरूप स्पष्ट न होने के कारण "अवैध" को "वैध" मानते गए.  इस तरह धरती के बीमार होने तक पहुँच गए.  अब पुनर्विचार की ज़रुरत है.  पुनर्विचार के लिए यह सही के स्वरूप का प्रस्ताव है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Monday, May 14, 2018

प्रतिस्पर्धा से मुक्ति

प्रतिस्पर्धा   ---> संघर्ष ---> शोषण ---> युद्ध

जीवचेतना में प्रतिस्पर्धा से शुरुआत है जो युद्ध में अंत होता है.  इसके बीच में संघर्ष और शोषण है.  जीव चेतना का चौखट ही ऐसा बना है.  ऐसा मेरे निरीक्षण-परीक्षण पूर्वक समीक्षा में आया है.  बचपन से अभी तक आप इसी लाइन पर चले हैं, अब इसके बिल्कुल विकल्प स्वरूप में (मध्यस्थ दर्शन का) यह प्रस्ताव आपके सामने आया है.  इसमें सर्वशुभ के आधार पर सोच है.  जबकि प्रतिस्पर्धा वाले तरीके को स्वशुभ के आधार पर सोच माना गया है.

सर्वशुभ के आधार पर जो प्रस्ताव आया है उसके आगे प्रतिस्पर्धा वाला तरीका छोटा दिखने लगता है.  तुलनात्मक तरीके से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं, फिर जो ज़रुरत होगा उसको हम कर ही लेंगे.

सर्वशुभ के प्रस्ताव का परीक्षण करने पर इसमें ठौर मिलने, इसके लिए काम करने की चाहत होती है.  इसमें ईर्ष्या-द्वेष बाधक है.  प्रतिस्पर्धा प्रवृत्ति इसकी विरोधी है.  सर्वशुभ में हमारा जितना यकीन बनता है प्रतिस्पर्धा वाला प्रवृत्ति उतना ढीला होता जाता है.

आप अपने को ही देखिये - ५ वर्ष पहले आप में जितना प्रतिस्पर्धा था, आज उतना नहीं है.  अब आगे चलके पूरा समझने पर प्रतिस्पर्धा भाव समाप्त हो जाएगा.  पूरा समझ में आना आवश्यक है.  आपके लक्षणों से मैं आपका मूल्यांकन करता हूँ, इसकी वास्तविकता का आप स्वयं मूल्यांकन करो.

सर्वशुभ का समझ जैसे-जैसे विकसित होता है प्रतिस्पर्धा विलय हो जाता है, उसका नामोनिशान नहीं बचता.  नामोनिशान नहीं बचता क्योंकि इसकी मौलिकता कुछ भी नहीं है.  प्रतिस्पर्धा का तौर-तरीका बदलता ही रहता है, इसलिए प्रतिस्पर्धा की परंपरा नहीं हो सकती.  आप लोग नौकरी के लिए जिस प्रतिस्पर्धा से गुजरे, २५ वर्ष पहले वैसा नहीं था, उससे १० वर्ष पहले वैसा भी नहीं था.  इतिहास आपके सामने रखा है.

प्रतिस्पर्धा के स्थान पर आत्म-विश्वास होना चाहिए.  आत्म-विश्वास ज्ञान-सम्पन्नता से आता है.  आत्मविश्वास से ही keen observation और quick decision लेना बनता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००८, अमरकंटक) 

Sunday, March 25, 2018

इस प्रस्ताव को इन्टरनेट पर ले जाने का तरीका

कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो स्वधर्म-विधर्म को सोचा नहीं है.  विधर्म को स्वीकारते हुए क्या कोई अपने-पराये से मुक्ति का सुझाव प्रस्तुत कर सकता है?

जिस संविधान में सीमा और सीमा-सुरक्षा के लिए युद्ध को वैध स्वीकारा हो - क्या वह सीमाओं से मुक्त विश्व का कोई सुझाव प्रस्तुत कर सकता है?

धर्म और संविधान जिसको "न करो" बताते रहे, वही बढ़ता रहा.  "क्या करना है" - यह पता नहीं चला.  एक के बाद एक और बड़े अपराध करने, धरती को और ज्यादा घायल करने, मानव का और शोषण करने की बात निकल के आ रही है.  सुविधा-संग्रह लक्ष्य के चलते सभी मानवों का सोच इसी के लिए अर्पित हुआ है.  अभी जो मानसिकता संसार में है उससे सकारात्मकता का सूत्र कैसे निकलेगा? उनसे हम क्या प्रश्न करें?  कैसे प्रश्न करें?

विगत में आदर्शवादी विधि से भी हम नकारात्मक भाग में गए और भौतिकवादी या विज्ञान विधि से तो पूरा नकारात्मक भाग में जा ही रहे हैं.  इन दोनों विधियों से जो मानसिकता बनती है वह ज्यादा-कम हर व्यक्ति के पास पहुंचा है.  इससे लोक मानसिकता में सुविधा-संग्रह का लक्ष्य बना.  उसके लिए प्रयास है - जो बाज़ार में वस्तुएं हैं उनको इकठ्ठा करना.  उसके लिए पैसा चाहिए.  पैसा चाहे कैसे भी आये - चोरी से, डाका से, व्यापार से, नौकरी से...  ये सब करने के बाद भी किसी का सुविधा-संग्रह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ.  यह यथास्थिति है.  अब सुविधा-संग्रह मानसिकता में लिप्त संसार से हम क्या उत्तर पायेंगे? 

सुविधा-संग्रह में ग्रस्त रहते हुए कोई सुविधा-संग्रह से मुक्त होने के विचार को पैदा नहीं कर सकता.  युद्ध मानसिकता से युद्ध मानसिकता से मुक्ति का विचार नहीं निकल सकता.  व्यापार मानसिकता से शोषण मुक्ति का विचार नहीं निकल सकता.  द्रोह-विद्रोह मानसिकता से न्याय का विचार नहीं निकल सकता.

इनसे हमे उत्तर मिलेगा यह भरोसा हमारा ख़त्म हो गया. 

प्रश्न:  इन्टरनेट के बारे में आपका क्या सोचना है?

उत्तर:  इन्टरनेट में सभी सूचनाओं को लाइब्रेरी बना के रख रहे हैं.  जो पहले जमीन पर था उसको अब आकाश में रख रहे हैं.  लेकिन लाइब्रेरी बनाने से क्या उद्धार हो गया? 

प्रश्न:  इन्टरनेट में सब नकारात्मक ही तो नहीं है, सकारात्मक भी तो है?

उत्तर:  अधिकांशतः लोग नकारात्मक पक्षों को देखने में ही लगे हैं.  सकारात्मक को देखने की इच्छा वाले इने-गिने हैं.  इन्टरनेट में वही है जो अभी संसार में प्रचलित है.  उसमे जो "सकारात्मक" जैसा लगता है उससे कोई निष्कर्ष निकलता नहीं है.  उस "सकारात्मकता" को हम अपना लें, उसका लोकव्यापीकरण कर दें - ऐसा उसमे कुछ नहीं है. 

यहाँ हम संसार में जो प्रचलित है उसके विकल्प स्वरूप में जो बातचीत करते हैं, वह सही में सकारात्मक है, अपने में हमारा यह स्वीकृति हुआ है.

प्रश्न:  इस बात को इन्टरनेट के माध्यम से जन सामान्य तक पहुंचाने का क्या सही तरीका होगा?

उत्तर:  सम्पूर्णता के साथ प्रस्तुत करने का तरीका है - ज्ञान को लेकर यह विकल्प प्रस्तुत हो गया है, जिसको अध्ययन करके समझा जा सकता है, और जीने में प्रमाणित किया जा सकता है.  यह सूचना दी जा सकती है.

प्रश्न:  संसार से जुड़ने के लिए अपनी बताने के साथ-साथ उनकी चाहत को भी तो कुछ पूछना पड़ेगा?

उत्तर:  मानव की चाहत को लेकर आप पूछ सकते हैं - ये चाहते हो या वो चाहते हो.  यदि आप संसार से पूछोगे आप क्या चाहते हो?  - तो उससे कुछ नहीं निकलेगा! 

(मध्यस्थ दर्शन के अनुसार) सकारात्मक चाहत का स्वरूप आप पहले रखिये, फिर पूछिए - ये चाहते हैं या नहीं चाहते हैं?  इसको अन्गुलिन्यास कर के संसार में जो दिग्गज कहलाते हैं, उनसे पूछा जाए!  इसको dilute करने से इसका उत्तर ही नहीं मिलेगा.

तकनीकी/यंत्र से इसका कोई उत्तर नहीं निकलेगा.  उत्तर तो कोई व्यक्ति ही देगा और व्यक्ति ही उत्तर को स्वीकारेगा. 

अब लोगों से पूछने के लिए - पहले सकारात्मक प्रेरणा रुपी मुद्दों को रखा जाए.  ये चाहिए या नहीं चाहिए - इसको पूछा जाए. 

उसके बाद उस चाहत को साकार करने के लिए कार्यक्रम प्रस्तावों को रखा जाए.  आप इनको करना चाहते हो या नहीं - यह पूछा जाए.

उसके बाद व्यवस्था में जीने के लिए प्रेरणास्पद मुद्दों को रखा जाए.  आप ऐसा जीना चाहते हो या नहीं चाहते हो - यह पूछा जाए.

इस ढंग से अपने अनुसार इस प्रस्ताव को इन्टरनेट पर ले जाने का तरीका बनता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक) 

Wednesday, March 21, 2018

प्रबोधन क्यों और कैसे - भाग ४


जीव चेतना विधि से मानव का शिक्षित होना नहीं हुआ.  जीवचेतना की शिक्षा में हम नौकरी और व्यापार के लिए पढ़ाई किये.  पहले जब शिक्षा कुछ ही लोगों के पास थी तो इस शिक्षा से नौकरी-व्यापार करना सार्थक हो जाता था.  अब जब सबको शिक्षा मिलने लगी तो वह सार्थक होना बंद हो गया.  इस शिक्षा के विकल्प की आवश्यकता है.

शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम बनाने की आवश्यकता होती है.  उसमे पाठ्यपुस्तकों की पहचान करने की बात होती है.  स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के लिए मध्यस्थ दर्शन वांग्मय है.  कक्षा १ से कक्षा ५ तक का पाठ्यक्रम हम तैयार कर चुके हैं.  बाकी सात कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम लिखना अभी शेष है.  उसके लिए मैं सोचता हूँ हमारे साथ जो विद्वान लोग जुड़े हैं, वे मिलके उसको लिखें.  आप से लिखना नहीं बनता है तो मेरे पास बैठो, मैं लिखा देता हूँ!

प्रश्न:  जीवन विद्या शिविर कार्यक्रम के बारे में आपका क्या मंतव्य है?

उत्तर:  जीवन विद्या शिविर प्रौढ़ शिक्षा या लोक शिक्षा विधि है.  उसको सुनने मात्र से उत्साह वर्धन होता है.  यह उत्साह सकारात्मक है - यह भी देखा गया.  ऐसा देखने पर यही बनता है कि इनके प्रतिभागियों को आगे अध्ययन कराया जाए.  उनको सीधे-सीधे जीवन का अध्ययन, अस्तित्व का अध्ययन और मानवीयता पूर्ण आचरण का अध्ययन से शुरू कराया जाए.  क्रमिक शिक्षा में हम ७वीं या ८वीं कक्षा में अस्तित्व दर्शन ज्ञान का ज़िक्र करते हैं - दोनों में यह अंतर है. 

जीवन विद्या शिविर से ७ दिन में सूचना दी जाती है कि यह समझने योग्य वस्तु है.  जीवन विद्या शिविर में क्या बताना है उसको "जीवन विद्या - अध्ययन बिंदु" नामक पुस्तिका में लिख कर दे दिया है. 

जीवन विद्या शिविर सर्वशुभ की सूचना का एक कार्यक्रम है.  सर्वशुभ के लिए क्या-क्या समझने की आवश्यकता है - यह सूचना देने के लिए जीवन विद्या शिविर है. 

मेरा किसी से आग्रह नहीं है कि आप अध्ययन करो ही!  यह प्रस्ताव रखा है - आपकी इच्छा है तो आप इसका अध्ययन करो.  आपकी इच्छा नहीं है तो मत करो!  हर व्यक्ति अपने मन से, विचार से, इच्छा से स्वतन्त्र है.  इच्छा होगी तो वह इसका अध्ययन करेगा, इच्छा नहीं होगी तो नहीं करेगा. 

क्या मेरी इस नीति से आप सहमत हैं?

इस पूरे कार्यक्रम में शिकायत करने की कोई जगह नहीं है.  आप चाहे इस रास्ते पर एक कदम चलें, या दस कदम चलें, आप जितना इसमें चलें उतने तक में इसकी सार्थकता दिखाई पड़ती है.  इस कार्यक्रम में कहीं काली दीवाल के पास जाने का कोई जुगाड़ ही नहीं है. 

यह प्रस्ताव सर्वमानव की ज़रुरत है - इसका हम निवेदन ही करते हैं.  मानव के नासमझी से अपराध हुआ है, फलस्वरूप धरती बीमार हो गयी है.  क्या मानव को नासमझ ही रहना है?  इसका उत्तर "नहीं" ही निकलता है, समझदार होने की आवश्यकता है - यही कहना बनता है.  समझदारी के लिए यह एक छोटा सा प्रस्ताव है.  सूचना हम देंगे, जिसको समझने की इच्छा है वे इसका अध्ययन कर सकते हैं.  सूचना के बिन्दुओं के विस्तार में जाना, स्वत्व बनाना, प्रमाणित होना - ऐसा जिसके मन में आता है, वह अध्ययन करेगा.  सूचना पहुँचते तक हम अध्ययन का ज़िक्र करते ही नहीं हैं.  पहले शिविर करिए, फिर ज़रुरत होगा तो अध्ययन करिए.  ये किताबें हमने बेचने के लिए तैयार नहीं की हैं!  इस पूरे कार्यक्रम में हमारे ऊपर आक्षेप का जगह नहीं है.  पूरी धरती के ७०० करोड़ लोग मिलके भी कोशिश कर लें तो भी इस कार्यक्रम के साथ शिकायत या आक्षेप नहीं कर पायेगा. 

मैं यह दावा करता हूँ - अपराध बुद्धि से ही इस कार्यक्रम पर कोई शिकायत या आक्षेप किया जा सकता है.  यह दावा मेरा व्यक्तिगत है.  इसमें मैं और किसी को involve नहीं करता हूँ. 

इस कार्यक्रम का एक अपना प्रभाव हुआ है, जो सकारात्मक होना गवाहित हुआ है.  तो इसको बनाए रखा जाये या नहीं?  बनाए रखा जाए!  - यही सज्जनता का उत्तर बनता है.

प्रश्न:  प्रबोधकों की प्रस्तुति में गुणवत्ता के बारे में आपका क्या मंतव्य है?

उत्तर:  प्रबोधकों की प्रस्तुति में गुणवत्ता की जहां तक बात है, उसमे देखा गया कि हर बार प्रबोधन करने के बाद अगली बार गुणवत्ता बढ़ती ही जाती है.  नीचे कोई आता ही नहीं है!  हर बार कोई नयी बात उजागर होता है, कम कुछ होता ही नहीं है.  इस तरह कुनबा जुड़ता गया है. 

प्रश्न:  प्रबोधक के अधूरे में रहते हुए भी कैसे काम चल जाता है?

उत्तर:  लोग हमारे पास हमे "अच्छा आदमी" मानके ही आते हैं.  अच्छाई को लेकर उनके पास पहले से भी कोई चित्रण रहता है.  उनको हम इस बात को अपनी अधूरी स्थिति में भी जैसे भी प्रस्तुत करते हैं - उनके लिए फिर भी नया होता है!  नया होने से उनमे एक उत्सव तो होता ही है! अब प्रस्तुति के बाद हम अपनी प्रस्तुति में कहाँ कमी रहा, उसको भरने की कोशिश करते ही हैं.  अभी तक जितनो ने भी जीवन विद्या का प्रबोधन किया - उन्होंने यही पाया!  अच्छाई के बाद अच्छाई की पूर्णता के लिए आदमी दौड़ता ही है!  उस विधि से पूरी बात एक दिन approach में आ जाती है.  दर्शन का सूचना पहले से रहता ही है, उसको आवश्यकता होने पर refer करते ही हैं.  एक शिविर के बाद दूसरे शिविर में और अच्छापन आता ही जाता है. 

लोगों ने स्वयंस्फूर्त इस कार्यक्रम में अपने तन-मन-धन को लगाया है.  इसको क्या कहा जाए?  क्या इसको स्वप्न कहें?  उन्माद कहें?  वास्तविकता कहें?  आवश्यकता है, कहें?  आवश्यकता नहीं है, कहें?  इस पर चर्चा हो सकती है.  इसके लिए मैंने अपना दरवाजा खुला रखा है. 

अभी तक घटनाक्रम ही है, अभी गम्य-स्थली में पहुँच गए - ऐसा न माना जाए.  लेकिन ये घटनाक्रम गम्य-स्थली की ओर है - ऐसा निर्णय हम ले सकते हैं.  जीवन विद्या कार्यक्रम से जिन परिणितियों को हम देख रहे हैं, उसको देख के मैं यह घोषणा कर सकता हूँ कि यह कार्यक्रम गम्यस्थली/लक्ष्य की ओर है.  भले ही धीरे गति हो या जल्दी गति हो.  सभी समान गति से जा रहे हैं, ऐसा भी नहीं है.  समान उद्देश्य से जा रहे हैं - यह सही है.  इस प्रकार गतिशील रहते हुए हम गम्यस्थली पर पहुंचेंगे - यह अरमान बनता है.  इसी गति से चलें, इससे धीरे चलें, या इससे ज्यादा गति से चलें - इस तरीके से चलके हम गम्यस्थली पर पहुँच जायेंगे, यह अरमान निर्मित होता है.

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)


प्रबोधन क्यों और कैसे - भाग ३

प्रबोधन की आवश्यकता, सार्थकता, प्रयोजन आपको स्वीकार होता है या नहीं?  मानव चेतना के लोकव्यापीकरण के लिए, मानवीयता प्रमाणित होने के लिए, मानवीय संविधान प्रभावित होने के लिए, मानवीयता पूर्ण आचरण हर मानव में प्रमाणित होने के लिए, हर मानव के व्यवस्था के प्रति स्पष्ट रहने के लिए प्रबोधन की आवश्यकता है. इसमें अनुभवगामी पद्दति से अध्ययन और अनुभवमूलक विधि से प्रबोधन का प्रावधान है.  यह निर्विवाद कार्यक्रम है.  इसको पूरा समझने के बाद, जीने के बाद यदि इसमें कोई कमी हो तो पुनः शोध करने की सोचा जा सकता है.  अभी तक तो यह पूरा पड़ता दिखता है.

दिव्य मानव परम्परा में सहअस्तित्व प्रमाण सुलभ हो जाता है.  देवमानव परंपरा में स्वाभाविक रूप में सर्वतोमुखी समाधान प्रमाण सर्वसुलभ हो जाता है.  वर्तमान में हम मानव और देवमानव पद की स्पष्टता पर जोर दे रहे हैं, जिससे मानव कम से कम मानव चेतना स्वरूप में प्रमाणित हो सकता है.

मानव चेतना में हर व्यक्ति को सुखी होना है.  मानव चेतना में क्लेश का कोई नामोनिशान नहीं है.  ठोकबजाऊ बात इतना ही है.  इसको हम और बल दे के, अपनी साहसिकता को नियोजित करके, संसार के साथ उपकार कार्य में लग गए.


प्रबोधन का लक्ष्य है - जिसको प्रबोधित कर रहे हैं, उसको समझ में आना चाहिए. 

प्रबोधन कैसे का उत्तर इस प्रकार है: -

प्रबोधन के लिए भाषा चाहिए.  कौन भाषा प्रयोग करेगा?  इसका उत्तर है - समझदार व्यक्ति.  अनुभवमूलक विधि से जो व्यक्त होता है वही समझदार है.  अनुभवगामी पद्दति से अध्ययन और अनुभव मूलक विधि से प्रमाण. 

भाषा में जो कह रहे हैं वह जिस वस्तु का नाम है वह वस्तु भास-आभास हो जाए, प्रतीत हो जाए, बोध हो जाए.

भाषा-भाव-मुद्रा (मूल्य या वस्तु को इंगित करने के लिए) -भंगिमा-अंगहार (body language) सहित हम प्रबोधन करते हैं.  भाषा लिखित रूप में रहेगी, चित्र रहेगा समझाने के लिए.  ध्वनि - आवश्यकता अनुसार जोर से या धीरे से बोलने की शिष्टता रहेगी.  सामने व्यक्ति को समझने वाला मानने के भाव से प्रबोधित करने की आवश्यकता है.  अध्ययन के हैडलाइन के नीचे ही सारे कार्यक्रम हैं.  शिविर, चर्चा, परिचर्चा, संवाद, संगोष्ठी - ये सब अध्ययन के ही अंगभूत हैं. 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Sunday, March 18, 2018

प्रबोधन क्यों और कैसे - भाग २

प्रबोधन पूर्णता के अर्थ में मानव में विश्वास स्थापित करने के लिए है.  पूर्णता को जीने में प्रमाणित करने की अर्हता को स्थापित करने के लिए प्रबोधन करते हैं.

पूर्णता है - गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता और आचरण पूर्णता

इस धरती पर गठनपूर्णता प्राकृतिक रूप से हो चुकी है.  बाकी दोनों स्थितियों को सम्भावना रूप में रखा है. 

गठनपूर्ण परमाणु जीवन स्वरूप में काम करता है.  हर मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है.  मानव परंपरा में अपराध मुक्ति, अपने-पराये से मुक्ति और क्लेश मुक्ति के लिए जीवन में क्रिया पूर्णता और आचरण पूर्णता की आवश्यकता बन गयी.  क्रियापूर्णता सर्वतोमुखी समाधान स्वरूप में प्रमाणित होता है.  उसके मूल में मानव चेतना ही वस्तु है.  चेतना का मतलब है - ज्ञान.

ज्ञान है - अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान.  इन तीनो ज्ञान के एकत्र होने से मानव चेतना है.  मानव चेतना में क्रियापूर्णता स्पष्ट होती है जो सर्वतोमुखी समाधान स्वरूप में प्रमाणित होती है.  सर्वतोमुखी समाधान ही मानव चेतना का स्वरूप है, जिसको अध्ययन कराने की व्यवस्था दिया है.  अध्ययन विधि से ये गम्य होता है. 

इतनी बात को पांचवी कक्षा तक के बच्चों को बोध करा सकते हैं या नहीं? 

शिक्षा परंपरा हर व्यक्ति को समझदार बनाने के लिए जिम्मेदार है.  अभी की शिक्षा हरेक को नौकरी और व्यापार में लगाने के लिए है.  हर व्यक्ति नौकरी या व्यापार करे - क्या यह संभव है?  इसके विकल्प में मानव चेतना विधि से समझदारी पूर्वक व्यवस्था में जीने की बात आयी.  यदि मानव समझदार होता है तो उसमें मानवीयता पूर्ण आचरण स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है.  संबंधों में मूल्य, चरित्र, नैतिकता प्रमाणित होता है.

मानवीयता पूर्ण आचरण का बोध माध्यमिक कक्षा के बच्चों को करा सकते हैं या नहीं?

मानवीयता पूर्ण आचरण का निश्चयन होने पर हम व्यवस्था में जीने की बात करते हैं.  व्यवस्था का सूत्र है - मानव मानवत्व सहित व्यवस्था है (परिवार में) और समग्र-व्यवस्था में भागीदार है (दस सोपानीय व्यवस्था में).   दस सोपानीय व्यवस्था में भागीदारी करना और परिवार में प्रमाणित होना - यह हर मानव की आवश्यकता है. 

"मानव" शब्द में नर-नारी दोनों समाहित हैं. 

  • समझदारी में हर नर-नारी समान हैं.
  • जीवन गठन रूप में हर नर-नारी समान हैं.
  • जीवन क्रिया रूप में हर नर-नारी समान हैं.
  • मानव लक्ष्य रूप में हर नर-नारी समान हैं.
  • व्यवस्था में भागीदारी करने में हर नर-नारी समान हैं.
  • मानवीयता पूर्ण आचरण करने में हर नर-नारी समान हैं.  
इस तरह नर-नारी में समानता के बिन्दुओं के आधार पर मानव-अधिकार भी स्पष्ट होते हैं.  मानव अधिकार की चाहत और नर-नारी में समानता की चाहत मानव परंपरा में है.  यह समानता की चाहत जीव-चेतना में सफल नहीं हो सकती और मानव-चेतना में यह चाहत सफल हुए बिना रह नहीं सकती.  इसको क्या प्रबल बनाया जाए या इसका अनदेखी किया जाए?  प्रबल बनाना है तो इसके लिए जी-जान लगाना पड़ेगा.

मानव चेतना के अध्ययन के लिए जितना प्रबंध की आवश्यकता है उसको दर्शन-वाद-शास्त्र स्वरूप में प्रस्तुत कर दिया.  उसको हम स्नातक कक्षा में पढ़ाने, समझने, समझाने को कह रहे हैं.  इसमें प्रवेश के लिए जीवन विद्या शिविरों की परंपरा स्थापित की है.

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)